हिंदी साहित्य एक वरदान
Updated: Dec 3, 2022
साहित्य समाज का दर्पण होता है। किसी भी समाज को जानने के लिए वहां के साहित्य को जानना जरूरी है। साहित्य भी समाज की ठीक-ठीक तस्वीर तक प्रस्तुत कर सकता है जब वह स्थानीय भाषा में लिखा हो। हिंदी भारत की एक बहुमान्य भाषा है। ज्यादातर लोग इसे समझते और बोलते हैं। इसलिए इस भाषा का साहित्य पूरे भारत का चित्र प्रस्तुत करने की क्षमता रखता है।
भारतीय दर्शन, इतिहास, प्राकृतिक सुंदरता, धर्म और रीति रिवाज को बड़ी सहजता से हिंदी साहित्य में पिरोया गया है। इसी कारण इसे वरदान कहा जा सकता है क्योंकि इसके माध्यम से हम बड़ी सहजता से भारत की आत्मा को समझ सकते हैं। भारतीय इतिहास का स्वर्णिम काल भक्ति काल को कहा जाता है। पूरे भारत में विदेशी शक्तियों का कब्जा हो गया था। भारतीय साहित्यकारों और कवियों को भगवान के दरबार के अलावा अन्य किसी दरबार में शरण ना मिली। इसी कारण इस वक्त की रचनाओं में गहराई है और भारत के यथार्थ दर्शन का खज़ाना भी। सूरदास कबीरदास तुलसीदास मीराबाई और गुरु नानक देव ने इस काल में जो कुछ भी रचा वह वेदों पुराणों गीता महाभारत तथा रामायण जैसे महाकाव्य का तत्व समा गया है । इसी काल में रामचरितमानस की रचना तुलसीदास जी ने की जब हुए 72 वर्ष के थे। अपने पूरे आध्यात्मिक जीवन का सार इस रचना में प्रकट करके कवि ने इसे 400 सालों के बीच की सबसे महान रचना बना दी। आधुनिक काल का भी हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाने में बड़ा हाथ है। महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी, डॉ रामकुमार वर्मा मैथिलीशरण गुप्त रामधारी सिंह दिनकर और उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी के साथ साथ जयशंकर प्रसाद जैसे प्रतिभा के धनी लेखक और कवियों ने हिंदी साहित्य को विश्व के अग्रणी साहित्य में से एक बना दिया।

हिंदी साहित्य अगर उपेक्षित रहा तो उसका सबसे बड़ा कारण हिंदी भाषियों की दमित भावना और कमतरी का भाव ही था। वर्तमान समय में एक बार फिर हिंदी की अस्मिता को लोगों ने पहचाना है तो इसके साहित्य की तरफ भी दुनिया के विद्वानों की नजर गई है। अब लोगों को धीरे धीरे समझ में आ रहा है कि हिंदी साहित्य कितना विशाल और ज्ञान समृद्ध है।
आशा करता हूं कि आप सबको मेरे विचार पसंद आए होंगे। कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा करें! इन शब्दों के साथ मैं अपनी वाणी को विराम देता हूं। धन्यवाद




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