भाषा और संस्कृति
किसी भी संस्कृति को समझने के लिए वहां की भाषा को समझना जरूरी है।
संस्कृतियों को समझना और उसका मूल्यांकन करना नस्लवाद के मुकाबले की चाबी है। हर व्यक्ति की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने आसपास की दुनिया में फैली सांस्कृतिक विविधता की समझ पैदा करें और अपनी संस्कृति की विशिष्ट का पता लगाने का प्रयास करे। मुखरित होकर अपनी संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का कर्तव्य भी हर किसी का है।
जन्म से हम जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वही हमारी मातृभाषा होती है। सारी संस्कार और व्यवहार हम इसी के द्वारासीखते हैं। इसी भाषा के साथ हम अपनी संस्कृति से जुड़ते हैं, फिर यह हमारी धरोहर बनती है और इसी के माध्यम से हम इसे आगे बढ़ते हैं। इतिहास को हमेशा मानव का इतिहास कहा जाता है। यह जानवरों का इतिहास नहीं है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि भाषा केवल मनुष्य को आती है। आज विकास के जिस मुकाम पर हम हैं, यहां तक पहुंचाने का कारण भी भाषा ही है, अन्यथा अतीत में हुए खोजो विचारों और चिंतनो की कोई जानकारी हम तक पहुंच ही नहीं सकती थी। किसी समाज में होने वाले व्यवहारिक विकास और परिवर्तन को जब समाज का बड़ा हिस्सा स्वीकार कर लेता है तो वह संस्कृति का हिस्सा बन जाता है। इस प्रकार संस्कृति का क्रमिक विकास होता है, और विकास की इस यात्रा को वहां की भाषा में लिखकर आगे बढ़ाया जाता है। समाज के जो लोग विचारक होते हैं अथवा लेखक होते हैं वे संस्कृति के कण-कण को पहले महसूस करते हैं और उसका शब्द रूप उसी भाषा में बनाते हैं जिसे उन्होंने बचपन से जाना है। उस संस्कृति में घटने वाली हर घटना के लिए शब्द मुहावरे कहावतें और लोकोक्तियां उनकी अपनी भाषा में ही होते है। अतः संस्कृति की पृष्ठभूमि और उसके विकास व महत्व को वही समझ सकता है या समझा सकता है जिसे इस भाषा का मौलिक ज्ञान हो। लोक साहित्य में संस्कृति की बारीक बातों का वर्णन होता है। अतः भाषा की अच्छी समझ होने पर ही हम संस्कृति को सटीकता से जान पाएंगे।

दुनिया की कोई संस्कृति अथवा सभ्यता बुरी नहीं होती वह बस अलग होती है। यूरोप में सफेद कपड़े पहने लड़की को आप शादी की बधाई दे सकते हैं मगर भारत में सफेद साड़ी में लिपटी महिला विधवा मानी जाती है। कहीं-कहीं सम्मान प्रदर्शित करने के लिए एक दूसरे पर थूकते हैं। कहीं पर भोजन के बाद डकार लगाना मेजबान का परम सम्मान होता है और कहीं पर इसे फूहड़ पन की निशानी मानी जाती है। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि मूल्य एक होने के बावजूद उसके प्रतिमान अलग-अलग हो सकते हैं। अज्ञानता वस समाज में इन्हीं प्रतिमान के आधार पर हम एक दूसरे से उलझ पड़ते हैं क्योंकि हमें लगता है कि दूसरे का तरीका गलत है। ऐसे में स्थानीय भाषा की समझ होने पर यह सब बारीक अंतर समझना आसान हो जाता है, अन्यथा ऊपर से तो हम दूसरी संस्कृति को बुरा ही मानेंगे जो आगे चलकर विरोध का कारण बनता है। यही भेदभाव और नक्सलवाद का भी आधार होता है।
अतः यह सिद्ध होता है कि किसी संस्कृति और सभ्यता को अच्छी तरह से समझने और जानने के लिए वहां की भाषा का ज्ञान होना जरूरी है।




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