“अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत”
- Ajay Dubey
- Feb 1, 2023
- 2 min read
गर्मी की छुट्टियां समाप्त हो चुकी थी।जय अपने दादा जी से मिलने उनके गांव जा रहा था।दो साल के बाद वह गांव जा रहा था इसलिए उसका उत्साह आकाश छू रहा था। दादा जी के साथ खेतों में जाना ,बाग से आम तोड़ना और तालाब में नहाने की याद उसे रोमांच से भर देती थी।
वह सुबह सुबह दादा जी के घर पहुंच गया। उस समय दादा जी चिड़िया को दाना चुगा रहे थे।तरह तरह के प्यारे प्यारे पक्षी उड़ रहे थे। कुछ तो दादा जी के कंधे पर भी बैठ जाते थे। यह दृश्य जय के मन में हौल पैदा कर रहा था। जय को देख दादा जी की खुशी का ठिकाना न रहा।पहले तो दादा जी ने जय को खूब प्यार किया फिर घर के बारे में और उसकी दसवीं की परीक्षा के बारे में पूछा और उसके बाद दोनों चिड़ियों को दाना चुगाने लगे।एक चिड़िया जय के कंधे पर आ बैठी।वह बहुत प्यारी थी। दादा जी ने बताया कि जल्द ही वह मां बनने वाली है।जय की आंखों में चिड़िया के छोटे–छोटे, प्यारे— प्यारे बच्चों का चित्र घूम गया।

शाम तक जय और उस चिड़िया की अच्छी दोस्ती हो गई।जय ने दादा जी से कहा कि वह उस चिड़िया का घोसला अपने कमरे में रखेगा। दादा जी ने उसे समझाया कि चिड़िया पेड़ पर बने घोंसले में ही सुख से रह सकती हैं। इंसानों के साथ रखना उन्हे मुसीबत में डालना है क्योंकि उन्हें कमरे में रहने की आदत नहीं होती। जय चुप हो गया,मगर उसका मन नहीं मान रहा था। दादा जी जब किसी काम में व्यस्त हो गए तब चुपके से जय ने चिड़िया को उसके घोंसले सहित अपने कमरे में ला कर बंद कर दिया। रात में खा पी कर लेटने से पहले एक बार फिर वह चिड़िया के साथ खेलने लगा।बहुत देर उसके साथ खेलने के बाद ही वह सोया।
रात में अचानक चिड़िया को प्रसव वेदना शुरु हुई। वह घोंसले से निकल अपने पक्षी मित्रों को बुलाने लगी। मगर उसकी आवाज कमरे से बाहर न जा सकी।वह उस अंधेरे कमरे में इधर उधर भटकने लगी।दर्द से बेहाल चिड़िया ऊपर तेज गति से चलते बिजली के पंखे से बेखबर ऊपर उड़ कर अपने समाज में पहुंचना चाहा। अचानक फड़फड़ाहट की एक तेज आवाज के साथ गहरा सन्नाटा फैल गया मगर जय और बगल के कमरे में सो रहे दादाजी की नींद खुल गई। जय ने बल्ब जलाया तो पाया कि पूरा कमरा पंख और खून के छीटो से भरा हुआ था। मारे डर के जय की आवाज नहीं निकल रही थी। तभी भागते हुए दादा जी भी कमरे में आए तो जय उनसे लिपट गया और सुबक सुबक कर रोने लगा। इसमें कोई संदेह नहीं था कि जय अपनी मनमानी और जिद पर पछता रहा था । दादा जी भी यह बात समझ रहे थे और सोच रहे थे कि “अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत”
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