आज की नारी अबला नहीं सबला है
- Ajay Dubey
- Dec 3, 2022
- 2 min read
Women are Power
मानव समाज में नर और नारी एक दूसरे के पूरक है। इसीलिए भारत में उन्हें लक्ष्मीनारायण कहा जाता है। लक्ष्मी और नारायण दोनों मिलकर ही सृष्टि का संचालन करते हैं। एक दूसरे के अभाव में या निर्बलता की स्थिति में यह संभव नहीं है। किसी भी समाज की नारी अगर अबला हो तो समाज सबल नहीं हो सकता। आज की नारी अपनी शिक्षा साहस और बड़ी सोच के कारण सबला है।

“ स्त्री पूरी तरह से सबला बने इसके लिए अभी और यात्रा बाकी है। हालांकि अब समाज से उसे विरोध की जगह समर्थन मिलने लगा है। अब उसे पापा के आंगन की नन्हीं सी चिड़िया के दायरे से बाहर निकलकर खुले आसमान में पंख फैलाना है। तब सही अर्थों में नारी सबला कही जाएगी।”

AAJ KI NAARI ABLA NAHI SABLA HAI
मानव समाज में नर और नारी एक दूसरे के पूरक है। इसीलिए भारत में उन्हें लक्ष्मीनारायण कहा जाता है। लक्ष्मी और नारायण दोनों मिलकर ही सृष्टि का संचालन करते हैं। एक दूसरे के अभाव में या निर्बलता की स्थिति में यह संभव नहीं है। किसी भी समाज की नारी अगर अबला हो तो समाज सबल नहीं हो सकता। आज की नारी अपनी शिक्षा साहस और बड़ी सोच के कारण सबला है।
वर्तमान समय में समाज का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां पर स्त्रियां पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर काम ना कर रही हो। हर कदम पर आज की नारी ने अपनी काबिलियत को सिद्ध किया है। वह दफ्तर में काम करने के बाद घर परिवार और रसोई भी संभालती है अर्थात पुरुषों से ज्यादा काम करती है और ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी उठाती है तो फिर अबला कैसे?… नारी सशक्तिकरण के इस जमाने में स्त्रियों को भी इस बात का ख्याल रखना होगा कि वह अपने आप को एक ऐसे बगीचे के रूप में न सजाएं जहां कोई भी अपने सुख के लिए टहल सके । उसे एक आसमान की तरह अपने आप को सजाना चाहिए जहां पहुंचना हर किसी का सपना हो। समाज ने ही नारी के लिए अबला जैसे पर्यायवाची गढ़े हैं। बोनसाई के पेड़ की तरह हमेशा स्त्रियों की जड़े और डालियां काटकर उन्हें गमले में सजाने का प्रयास होता रहा है। अब जबकि स्त्रियों ने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी सफलता के झंडे गाड़े हैं तो फिर उन्हें पुत्री मां और पत्नी के सांचे से बाहर निकलकर एक इंसान के रूप में अपनी उपयोगिता और महत्व को सिद्ध करना होगा। उन्हें पेप्सीको की इंदिरा नूई, किरण बेदी, मदर टेरेसा, और कल्पना चावला को अपना आदर्श बनाकर अपने सपनों को सजाने सवारने और पूरा करने का प्रयास करना चाहिए।
स्त्री पूरी तरह से सबला बने इसके लिए अभी और यात्रा बाकी है। हालांकि अब समाज से उसे विरोध की जगह समर्थन मिलने लगा है। अब उसे पापा के आंगन की नन्हीं सी चिड़िया के दायरे से बाहर निकलकर खुले आसमान में पंख फैलाना है। तब सही अर्थों में नारी सबला कही जाएगी।
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