दुख से मुक्ति कैसे पाए ?...
- Ajay Dubey
- Feb 5, 2023
- 2 min read
बॉक्सिंग अथवा कुश्ती के खेल में हम देखते हैं कि दोनों परस्पर विरोधी खिलाड़ी खेल शुरू होने से पहले एक दूसरे से हाथ मिलाते हैं और अपने पंजे भिड़ाते हैं। हम सबको लगता है कि यह खेल की केवल औपचारिकता है। मगर सच्चाई केवल इतनी नहीं है। वास्तव में खेल के मैदान में उतरे दोनों खिलाड़ियों का उद्देश्य जीत होती है। जीतने के लिए आपके पास आपका कोई न कोई विरोधी होना है चाहिए। विरोधी खिलाड़ी के बिना आप कितने भी महान खिलाड़ी क्यों हो, आपने तो खेल सकते हो और न जीत सकते हो। इसीलिए खिलाड़ी अपने विरोधी खिलाड़ी का पहले स्वागत करता है उससे मिलकर उसकी ताकत का अंदाजा लगाता है तब अपनी योजना बनाता है और उसे पराजित करके जीत हासिल करता है। इस खेल की ही तरह जीवन में जिन्हें हम तो समझते हैं वह वास्तव में एक चुनौती है उस चुनौती को जब तक हम दिल से स्वीकार नहीं करेंगे तब तक उससे उबर कर सफल नहीं हो सकते अर्थात खुशी की प्राप्ति नहीं कर सकते।

दुख जीवन में ना आए ऐसा तो संभव ही नहीं है मगर दुख से आप दुखी ना हो यह संभव जरूर है। इसके लिए आपको बस इतना करना होता है कि आप अपने जीवन में आए हुए दुख को पूरी तरह से स्वीकार कर ले। कोई भी दुख आपको तभी तक तकलीफ देता है जब तक आप उसे स्वीकार नहीं कर लेते। दुख को स्वीकार करते ही आप दुख से ऊपर उठकर उस से निजात पाने के प्रयास में लग जाते हैं और आपकी आंखों में उस समय का मंजर घूमने लगता है जब आप इससे उबर कर सुखद स्थिति में पहुंच जाते हैं। जीवन का सारा खेल स्वीकार करने या अस्वीकार करने के बीच में ही है। जो भी परिस्थितियां जीवन में आए उन्हें स्वीकार करते ही आप उनके अस्तित्व से ऊपर उठ जाते हैं और अगर स्वीकार नहीं करते तो फिर अंदर ही अंदर कुड़बुडाते आते रहते हैं, चिढ़ते रहते हैं, गुस्से में रहते हैं और अशांत रहते हैं। कुछ लोगों को आपने देखा होगा जो मौसम के बदलने पर भी शिकायत करते हैं। हर किसी के आचरण पर उन्हें कोई न कोई शिकायत रहती है। हर व्यक्ति और घटना में कोई न कोई नींद में निकालते रहते हैं। यह उनकी सोच उन्हें हमेशा दुख और अशांत से भरे रहती है। वे संसार को अपने हिसाब से चलते हुए देखना चाहते हैं जोकि असंभव है, क्योंकि यहां जन्म लेने वाले हर व्यक्ति का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है, सबकी अपनी-अपनी सोच है।

अतः स्वीकार करना ही एकमात्र तरीका है जिससे जीवन में शांति और सुकून आ सकता है। जिस प्रकार दिन और रात समय का सत्य है उसी प्रकार सुख और दुख हमारे जीवन का सत्य है। दुख के बिना सुख और सुख के बिना दुख अधूरा है तथा एक दूसरे के बिना उनका अस्तित्व भी असंभव है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार रात के बिना दिन नहीं हो सकता और दिन के बिना रात नहीं हो सकती। क्या हम दिन को स्वीकार कर रात को अस्वीकार करते हुए जी सकते हैं? नहीं ना! ठीक उसी प्रकार दुख को अस्वीकार करके हम जीवन भी नहीं जी सकते। जिंदा रहने और सुखी रहने के लिए जरूरी है कि हम दुख को स्वीकार करें।
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